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शालिवाहन शक 1859 – 1860

मराठी त्योहार 1938

नई दिल्ली, दिल्ली, भारत · 12 चांद्र मास
नई दिल्ली, दिल्ली, भारत बदलें

1938 में मराठी कैलेंडर के अनुसार 256 त्योहार और व्रत-पर्व आते हैं। प्रमुख उत्सवों में शामिल हैं: गणतंत्र दिवस, Dhulivandan, गुड़ी पड़वा, स्वतंत्रता दिवस, गणेश चतुर्थी। वैदिक पंचांग में नए हैं? देखें यह कैसे काम करता है।

समय प्रारूप

1938 के मराठी महीने

गुड़ी पड़वा, 1 अप्रैल 1938 को Shalivahan Shaka 1859 से 1860 हो जाता है।

महीना शुरू समाप्त दिन महीना
मार्गशीर्ष Margashirsh 3 दिस॰ 1937 1 जन॰ 1938 30 दिसंबर 1937 देखें
पौष Paush 2 जन॰ 1938 31 जन॰ 1938 30 जनवरी देखें
माघ Magh 1 फ़र॰ 1938 2 मार्च 1938 30 फ़रवरी देखें
फाल्गुन Phalgun 3 मार्च 1938 31 मार्च 1938 29 मार्च देखें
चैत्र Chaitra 1 अप्रैल 1938 30 अप्रैल 1938 30 अप्रैल देखें
वैशाख Vaishakh 1 मई 1938 29 मई 1938 29 मई देखें
ज्येष्ठ Jyeshtha 30 मई 1938 27 जून 1938 29 मई देखें
आषाढ Ashadh 28 जून 1938 27 जुल॰ 1938 30 जून देखें
श्रावण Shravan 28 जुल॰ 1938 25 अग॰ 1938 29 जुलाई देखें
भाद्रपद Bhadrapad 26 अग॰ 1938 23 सित॰ 1938 29 अगस्त देखें
आश्विन Ashwin 24 सित॰ 1938 23 अक्तू॰ 1938 30 सितंबर देखें
कार्तिक Kartik 24 अक्तू॰ 1938 21 नव॰ 1938 29 अक्तूबर देखें
मार्गशीर्ष Margashirsh 22 नव॰ 1938 21 दिस॰ 1938 30 नवंबर देखें
पौष Paush 22 दिस॰ 1938 20 जन॰ 1939 30 दिसंबर देखें
साल, महीने दर महीने
दिखाएँ
01

जनवरी

Paush पौष
02

फ़रवरी

Magh माघ
03

मार्च

Phalgun फाल्गुन
04

अप्रैल

Chaitra चैत्र
05

मई

Vaishakh वैशाख
06

जून

Jyeshtha ज्येष्ठ
07

जुलाई

Ashadh आषाढ
08

अगस्त

Shravan श्रावण
व्रत एवं उपवास के दिन
अमावस्या
09

सितंबर

Bhadrapad भाद्रपद
सित॰1
देवी गौरी (महालक्ष्मी)
सित॰2
देवी गौरी (महालक्ष्मी)
सित॰3
देवी गौरी (महालक्ष्मी)
सित॰8
भगवान विष्णु, भगवान गणेश
सित॰24
देवी दुर्गा
10

अक्टूबर

Ashwin आश्विन
अक्तू॰2
देवी दुर्गा
अक्तू॰3
दशहरा मुख्य
भगवान राम, देवी दुर्गा
अक्तू॰8
देवी लक्ष्मी, भगवान कृष्ण
अक्तू॰20
धनतेरस मुख्य
भगवान धन्वंतरि, देवी लक्ष्मी
अक्तू॰22
दीपावली मुख्य
देवी लक्ष्मी
अक्तू॰24
यमराज, यमुना
11

नवंबर

Kartik कार्तिक
12

दिसंबर

Margashirsh मार्गशीर्ष

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मराठी वर्ष 1 जनवरी के बजाय गुढी पाडवा पर क्यों आरंभ होता है?
गुढी पाडवा, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, मराठी नववर्ष है — वही दिन जब शालिवाहन शक बढ़ता है। यह वसंत की नई चाँद के बाद मार्च अंत या अप्रैल आरंभ में आता है। यह चुनाव वर्ष-आरंभ को वसंत के नवीनीकरण और शालिवाहन की विजय की कथा से जोड़ता है, जिसके लिए गुढी ध्वजा के रूप में खड़ी की जाती है। यह वर्ष के साढ़े-तीन मुहूर्तों में से एक है, जिस पर बिना अलग मुहूर्त के कोई नया कार्य आरंभ हो सकता है। पारंपरिक मराठी कैलेंडर में 1 जनवरी की कोई भूमिका नहीं, यद्यपि वह नागरिक रूप से मनाया जाता है।
साढ़े-तीन मुहूर्त क्या हैं?
साढ़े-तीन मुहूर्त मराठी वर्ष के वे दिन हैं जो इतने शुभ माने जाते हैं कि कुछ नया आरंभ करने — व्यवसाय, खरीद, यात्रा, विवाह — से पहले अलग मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। तीन पूर्ण हैं गुढी पाडवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा), अक्षय्य तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया), और दसरा/विजयादशमी (आश्विन शुक्ल दशमी); आधा है बलिप्रतिपदा/दिवाळी पाडवा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)। सोना खरीदना, दुकान खोलना और गृह-प्रवेश इन दिनों पर बहुतायत से होते हैं।
मराठी वर्ष में गणेशोत्सव कब आता है?
गणेशोत्सव गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, अगस्त अंत या सितंबर) से आरंभ होकर अनंत चतुर्दशी तक दस दिन चलता है, जब मूर्तियों का विसर्जन होता है। यह महाराष्ट्र का सबसे बड़ा सार्वजनिक त्योहार है। सार्वजनिक मंडल — जिन्हें लोकमान्य टिळक ने 1893 में पुणे में समाज-संगठन के साधन के रूप में पुनर्जीवित किया — घरेलू स्थापना के साथ रहते हैं। सुहागिनों की तीन दिन की ज्येष्ठा गौरी पूजा (आवाहन, पूजन, विसर्जन) इसी अवधि में आती है। सटीक 2026 तारीख़ों के लिए भाद्रपद का मासिक दृश्य देखें।
वट पौर्णिमा क्या है और यह उत्तर भारत की वट सावित्री से कैसे भिन्न है?
वट पौर्णिमा महाराष्ट्र में ज्येष्ठ पूर्णिमा (जून) पर मनाई जाती है, जब सुहागिनें व्रत रखकर वट (बरगद) वृक्ष की धागे से परिक्रमा करती हैं और सावित्री के स्मरण में पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं, जिसने यम से सत्यवान को वापस जीता था। उत्तर भारत वही सावित्री व्रत पंद्रह दिन पहले ज्येष्ठ अमावस्या पर करता है, उसे वट सावित्री कहते हैं। दोनों एक ही कथा भिन्न तिथियों पर हैं — महाराष्ट्र पूर्णिमा से, उत्तर अमावस्या से जोड़ता है। यह कैलेंडर दोनों को उनकी तिथियों पर रखता है।
पंढरपूर वारी क्या है और कब होती है?
वारी पंढरपूर में विठ्ठल के मंदिर तक की महान वैष्णव तीर्थयात्रा है। वारकरी संत ज्ञानेश्वर (आळंदी से) और संत तुकाराम (देहू से) की पालखियों के पीछे सप्ताहों चलकर, अभंग गाते हुए, आषाढी एकादशी (आषाढ शुक्ल एकादशी, जून/जुलाई) पर पहुँचते हैं। दूसरी वारी कार्तिकी एकादशी (नवंबर) पर पहुँचती है। आषाढी एकादशी चातुर्मास का आरंभ भी है — प्रबोधिनी (कार्तिकी) एकादशी पर समाप्त होने वाले चार पवित्र महीने, जिनमें विवाह आदि बड़े शुभ कार्य परंपरागत रूप से टाले जाते हैं।