बलि प्रतिपदा
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
बलि प्रतिपदा को दिवाली पाडवा क्यों कहते हैं
बलि प्रतिपदा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होती है, जो दिवाली अमावस्या के बाद पहली चंद्र तिथि है। महाराष्ट्र में इसे दिवाली पाडवा कहा जाता है। यह दिन उदार राजा बलि और वामन कथा का स्मरण करता है, जिसमें विष्णु राजा बलि को परंपरा में सम्मानित स्थान देते हैं।
दिवाली-क्रम में यह नई शुरुआत का भाव रखता है। दीप और रंगोली जारी रहते हैं, परिवार उत्सव के वस्त्र पहनते हैं और बलि पूजा या घरेलू प्रार्थना करते हैं। कुछ मराठी पंचांग इसे विक्रम संवत के वर्ष-परिवर्तन से भी जोड़ते हैं, जबकि क्षेत्रीय नववर्ष की सबसे प्रमुख परंपरा गुजरात में है।
दिवाली पाडवा से पारिवारिक रीतियाँ भी जुड़ी हैं। कई महाराष्ट्रीय घरों में विवाहित दंपति आरती, उपहार या विशेष भोजन से स्नेह और परस्पर सम्मान व्यक्त करते हैं। अन्नकूट और गोवर्धन पूजा व्यापक प्रतिपदा-परंपरा से जुड़े हैं, लेकिन नागरिक तिथि और पूजा-क्रम क्षेत्रीय नियम से बदल सकते हैं, इसलिए पृष्ठ अलग रहने चाहिए।
अनुष्ठान एवं परंपरा
बलि प्रतिपदा राजा बलि के स्मरण को महाराष्ट्र के दिवाली पाडवा की पारिवारिक रीतियों से जोड़ती है। हर घर में एक ही क्रम नहीं होता।
- सुबह का स्नान और उत्सव की तैयारी: कई घर अभ्यंग स्नान, स्वच्छ वस्त्र, फिर से सजाए दीप और रंगोली के साथ दिवाली-क्रम आगे बढ़ाते हैं।
- राजा बलि का पूजन या स्मरण: परिवार में प्रचलित चित्र, सजावट, कथा या प्रार्थना से राजा बलि का सम्मान किया जाता है।
- दीप प्रज्वलित करना: घर के देवस्थान और प्रवेश पर फिर से दीये जलाकर दिवाली का प्रकाश जारी रखा जाता है।
- विवाहित दंपति की रीति: कई महाराष्ट्रीय घरों में पत्नी पति की आरती करती है और दंपति उपहार या उत्सवी भाव का आदान-प्रदान करते हैं; यह सांस्कृतिक रीति है, सर्वमान्य अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं।
- उत्सव का भोजन और संबंधित पूजा: विशेष भोजन बाँटा जाता है और जिस घर में अन्नकूट या गोवर्धन पूजा इसी दिन होती है, वहाँ वह परंपरा के अनुसार की जाती है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
यह पर्व चंद्र पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के संयोग पर निर्धारित होता है।
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।