Lalita Panchami
Goddess Lalita
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
महत्व और कथा
ललिता पंचमी देवी ललिता का सम्मान करती है, जिनकी पूर्ण रूप से ललिता त्रिपुर सुंदरी के रूप में पूजा होती है, और जो शाक्त एवं श्रीविद्या परंपराओं में देवी का सौम्य तथा परम रूप हैं। उनका नाम ही उनके स्वभाव को धारण करता है: ललिता का अर्थ है वह जो लीला करती हैं अथवा जो सुकुमार और सौम्य हैं, और उन्हें उग्र रूप के बजाय महादेवी के एक करुणामयी, ममतामयी रूप के रूप में आवाहित किया जाता है। श्रीविद्या में वे वह देवी हैं जिनकी पूजा श्रीयंत्र के माध्यम से होती है, अर्थात् वह ज्यामितीय आरेख जिसे उनका ही स्वरूप माना जाता है।
यह दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि (शुक्ल पक्ष पंचमी) को पड़ता है, जिससे यह शारदीय नवरात्रि के पाँचवें दिन आता है, अर्थात् देवी की शरद ऋतु की नौ रात्रियों की उपासना। चूँकि नवरात्रि देवी के अनेक रूपों को समर्पित है, अतः ललिता पंचमी इसके भीतर उनके सौम्य, अधिष्ठात्री रूप के सम्मान के अवसर के रूप में स्वाभाविक रूप से स्थान पाती है। महाराष्ट्र में यह दिन उपांग ललिता व्रत के रूप में मनाया जाता है, जो उनके नाम पर लिया गया एक व्रत है।
यह अनुष्ठान किसी बड़े सार्वजनिक उत्सव के बजाय शांत और भक्तिमय रहता है, यही कारण है कि व्यापक पंचांग में इसे साधारण महत्व का माना जाता है। इसे मुख्यतः महाराष्ट्र और गुजरात में, तथा उत्तर और पूर्व भारत के कुछ भागों में, उन घरों तथा भक्तों द्वारा मनाया जाता है जो देवी के इस रूप की ओर आकर्षित होते हैं। ध्यान घर में अथवा उनकी प्रतिमा के समक्ष पूजन, उनकी स्तुति के पाठ, और व्रत के पालन पर केंद्रित रहता है, और यह सब नवरात्रि के दिनों के व्यापक ढाँचे के भीतर ही होता है।
अनुष्ठान एवं परंपरा
अनुष्ठान सौम्य और भक्तिमय होता है, जो नवरात्रि के दिनों के भीतर देवी ललिता के पूजन पर केंद्रित रहता है। सामान्य प्रथाओं में निम्नलिखित हैं:
- व्रत रखना: अनेक भक्त दिन भर व्रत रखते हैं, और महाराष्ट्र में यह दिन उपांग ललिता व्रत के रूप में मनाया जाता है, जो देवी के नाम पर लिया गया एक व्रत है।
- ललिता देवी का पूजन: देवी का पूजन उनकी प्रतिमा या चित्र के समक्ष होता है, और श्रीविद्या परंपरा में श्रीयंत्र के समक्ष, जिसे उनका स्वरूप माना जाता है।
- पुष्प और दीपक अर्पित करना: ताजे पुष्प, जलता हुआ दीपक और अन्य सरल वस्तुएँ देवता के समक्ष रखी जाती हैं, और पूजन स्वच्छ तथा सहज रखा जाता है।
- ललिता सहस्रनाम का पाठ: ललिता सहस्रनाम, अर्थात् देवी के एक हज़ार नाम, भक्ति के मुख्य कार्य के रूप में पढ़े जाते हैं, प्रायः देवी की अन्य स्तुतियों के साथ।
- शारदीय नवरात्रि के भीतर पूजन: यह दिन व्यापक नौ-रात्रि नवरात्रि उपासना के अंग के रूप में मनाया जाता है, अतः यह पूजा परिवार की चल रही देवी आराधना के भीतर ही रहती है।
- व्रत का पारण: जो व्रत रखते हैं वे पूजन पूर्ण करके व्रत खोलते हैं, और अर्पित भोजन को प्रसाद रूप में परिवार में बाँटते हैं।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
Observed on the Panchami tithi of Ashwin (Shukla paksha), reckoned by sunrise (udaya tithi).
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।