Sant Tukaram Beej
Sant Tukaram
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
महत्व और कथा
संत तुकाराम बीज संत तुकाराम के प्रस्थान का स्मरण कराती है, जिन्हें तुकाराम महाराज और स्नेह से तुकोबा कहा जाता है, और जो महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा के सर्वाधिक प्रिय संत-कवियों में से एक हैं। वे सत्रहवीं शताब्दी में इंद्रायणी के तट पर पुणे के निकट देहू नामक नगर में रहते थे और विट्ठल के परम भक्त थे, जो पंढरपुर में पूजित विष्णु का रूप हैं। उनके पद सरल, सीधी भाषा में दिव्य के प्रति विरह का गान करते हैं, और वे आज भी साधारण जन के हृदय के निकट बने हुए हैं।
उनके अभंग, वे लघु भक्ति-पद जिनके लिए वे विशेष रूप से जाने जाते हैं, वारकरी परंपरा की आधारशिला हैं और जहाँ कहीं इसके अनुयायी एकत्र होते हैं वहाँ गाए जाते हैं। ये भक्ति, विनम्रता तथा ईश्वर की ओर मुड़े एक साधारण जीवन के संघर्षों की बात कहते हैं, और उनकी सीधी-सच्ची प्रामाणिकता ही उन्हें इतना प्रिय बनाती है। इनके माध्यम से तुकाराम ने इस परंपरा को एक ऐसा स्वर दिया जिसे कोई भी अपना सकता है, और उनके अभंगों का गायन आज भी वारकरी भक्ति का जीवंत हृदय है।
दीर्घ परंपरा के अनुसार, तुकाराम सशरीर वैकुंठ, विष्णु के धाम, को प्रस्थान कर गए, इस घटना को सदेह वैकुंठ-गमन के रूप में स्मरण किया जाता है। यह दिन, चैत्र के कृष्ण पक्ष का बीज (द्वितीया तिथि), उसी प्रस्थान का स्मरण कराता है, यही कारण है कि यह उनके नाम को धारण करता है। यह स्मरण देहू में केंद्रित है, जो स्थल उनके वैकुंठ-स्थान के रूप में माना जाता है, और इसे महाराष्ट्र भर में जहाँ कहीं वारकरी भक्ति जीवित है, वहाँ मनाया जाता है।
अनुष्ठान एवं परंपरा
यह दिन स्मरण के भाव में मनाया जाता है, जिसके केंद्र में संत के पदों का गायन रहता है। सामान्य प्रथाओं में निम्नलिखित हैं:
- कीर्तन और अभंग गायन: भक्त कीर्तन (गान में भक्ति-कथा-कथन) तथा तुकाराम के अभंगों के गायन के लिए एकत्र होते हैं, जो इस दिन के भाव को धारण करते हैं।
- प्रातःकाल का स्मरण: अनेक स्थानों पर इस दिन को प्रातःकाल मनाया जाता है, जो संत के प्रस्थान से जुड़ी वेला है, प्रार्थना और गान के साथ।
- यात्रा: संत के सम्मान में यात्रा निकाली जाती है, जिसके साथ झाँझ और मृदंग का वादन तथा विट्ठल के नाम का जप होता है।
- विट्ठल की भक्ति: चूँकि तुकाराम का जीवन पंढरपुर के विट्ठल को समर्पित था, अतः इस दिन का पूजन उसी रूप की ओर मुड़ जाता है, उनके नाम के पुनरावर्तन के साथ।
- देहू में एकत्र होना: भक्त इंद्रायणी के तट पर बसे उस नगर देहू आते हैं, जो उनके वैकुंठ-स्थान के रूप में माना जाता है, ताकि उनके प्रस्थान से जुड़े स्थल पर इस दिन का स्मरण करें।
- पाठ और चिंतन: अभंगों तथा संत के जीवन की कथाओं को पढ़ा और उन पर चिंतन किया जाता है, जो इस दिन के स्मृति-भाव के अनुरूप है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
Observed on the Dwitiya tithi of Chaitra (Krishna paksha), reckoned by sunrise (udaya tithi).
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।