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वैदिक ऋतुएं

वैदिक ऋतुएं

2026 जानें कि आप किस वैदिक ऋतु में हैं और यह आपके आहार, स्वास्थ्य और दैनिक दिनचर्या को कैसे प्रभावित करती है।

अभी वर्षा ऋतु चल रही है, यही आज की वैदिक ऋतु है।

शिशिर

तिथियां: 14 जन॰ 2026 — 13 मार्च 2026

सौर माह: माघ-फाल्गुन

ठंड, आत्मचिंतन, विश्राम

वसंत

तिथियां: 14 मार्च 2026 — 14 मई 2026

सौर माह: चैत्र-वैशाख

नवीनता, नई शुरुआत, पुष्पन

ग्रीष्म

तिथियां: 15 मई 2026 — 15 जुल॰ 2026

सौर माह: ज्येष्ठ-आषाढ़

गर्मी, तीव्रता, पकना

वर्षा

वर्तमान ऋतु

तिथियां: 16 जुल॰ 2026 — 16 सित॰ 2026

सौर माह: श्रावण-भाद्रपद

वर्षा, नवजीवन, वृद्धि

85% बीत चुका · 9 दिन शेष

शरद

तिथियां: 17 सित॰ 2026 — 15 नव॰ 2026

सौर माह: अश्विन-कार्तिक

फसल, त्योहार, स्पष्टता

हेमंत

तिथियां: 16 नव॰ 2026 — 13 जन॰ 2027

सौर माह: मार्गशीर्ष-पौष

शीत आगमन, तैयारी, संरक्षण

वैदिक ऋतुएं (ऋतु) क्या हैं?

अपनी वर्तमान ऋतु जानना आपको सही आहार लेने, स्वस्थ रहने और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की योजना बनाने में सहायता करता है। छह वैदिक ऋतुओं में से प्रत्येक के लिए आयुर्वेद में विशिष्ट ऋतुचर्या — आहार, व्यायाम और दैनिक दिनचर्या के निर्देश — दिए गए हैं। त्योहार, विवाह और कृषि गतिविधियां पारंपरिक रूप से ऋतु-संक्रमण के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। यदि आप आयुर्वेद का पालन करते हैं, योग करते हैं, या प्रकृति की लय के अनुसार जीवन जीना चाहते हैं — तो ऋतु पंचांग आपका प्रारंभिक बिंदु है।

ऋतु (संस्कृत: ऋतु) पारंपरिक हिन्दू पंचांग की छह-ऋतु प्रणाली है। पश्चिमी चार-ऋतु प्रणाली के विपरीत, यह पद्धति एक विशिष्ट मानसून ऋतु (वर्षा) को मान्यता देती है और शीतकाल को दो चरणों में विभाजित करती है — शीतपूर्व (हेमंत) और गहन शीत (शिशिर)। छह ऋतुएं हैं: वसंत (बहार), ग्रीष्म (गर्मी), वर्षा (मानसून), शरद (पतझड़), हेमंत (शीतपूर्व) और शिशिर (शीत)। प्रत्येक लगभग 60 दिनों की होती है।

ऋतु की अवधारणा भारतीय संस्कृति में गहराई से व्याप्त है — आयुर्वेदिक स्वास्थ्य विधानों से लेकर शास्त्रीय संगीत (ऋतुओं के अनुसार निर्धारित राग), काव्य (कालिदास का ऋतुसंहार) और प्रमुख त्योहारों के निर्धारण तक। प्रत्येक ऋतु की विशिष्ट विशेषताएं बताती हैं कि क्या खाएं, कैसे व्यायाम करें और कौन सी गतिविधियां सर्वाधिक लाभकारी हैं।

ऋतु तिथियां कैसे निर्धारित होती हैं?

यहां दर्शाई गई तिथियां पारंपरिक हिन्दू सौर पंचांग (सौर मान) का अनुसरण करती हैं, जहां प्रत्येक ऋतु दो सौर मासों में फैली है। शिशिर माघ माह से आरंभ होती है (लगभग 14 जनवरी, मकर संक्रांति के साथ), और इसके बाद प्रत्येक ऋतु क्रमानुसार आती है। इस प्रणाली का उपयोग सहस्राब्दियों से कृषि चक्र, त्योहारों और मौसमी स्वास्थ्य पद्धतियों को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता रहा है।

ये पारंपरिक तिथियां अनुमानित हैं और प्रत्येक वर्ष लगभग समान रहती हैं। प्रत्येक ऋतु का वास्तविक जलवायु आगमन क्षेत्र के अनुसार भिन्न होता है — मानसून पश्चिमी तट पर मैदानों से पहले आता है, और शीत ऋतु हिमालय में पहले प्रारंभ होती है। ऋतु पंचांग एक मानकीकृत संदर्भ प्रदान करता है जो पूरे भारत में साझा किया जाता है, भले ही स्थानीय मौसम प्रारूप भिन्न हों।

छह वैदिक ऋतुएं

वसंत ऋतु (बहार)

14 मार्च – 14 मई। नवजीवन और पुष्पन की ऋतु। आयुर्वेद शीतकाल में संचित कफ को शुद्ध करने के लिए हल्के आहार की सलाह देता है — कड़वी सब्जियां, शहद और जौ लें। होली, उगादि, रामनवमी और चैत्र नवरात्रि इसी ऋतु में आते हैं। नई शुरुआत के लिए आदर्श।

ग्रीष्म ऋतु (गर्मी)

15 मई – 15 जुलाई। चरम ताप की ऋतु। छाछ, नारियल पानी, तरबूज और सत्तू के पेय से ठंडक पाएं। दोपहर में भारी व्यायाम से बचें। वट सावित्री और अन्य ग्रीष्मकालीन व्रत इसी अवधि में आते हैं। सुबह और शाम बाहरी गतिविधियों के लिए सर्वोत्तम हैं।

वर्षा ऋतु (मानसून)

16 जुलाई – 16 सितंबर। जीवनदायिनी वर्षा की ऋतु। जठराग्नि कमजोर होती है — आयुर्वेद गर्म, हल्के, ताजे पके भोजन की और कच्चे सलाद से बचने की सलाह देता है। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी यहीं आते हैं। जल की गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर विशेष ध्यान दें।

शरद ऋतु (पतझड़)

17 सितंबर – 15 नवंबर। फसल कटाई की ऋतु जिसमें वर्ष के सबसे भव्य त्योहार आते हैं: नवरात्रि, दशहरा और दीपावली। विवाह, नए उपक्रम और संस्कारों के लिए सर्वाधिक शुभ ऋतु। ग्रीष्म में संचित पित्त को शांत करने के लिए मधुर, कड़वे आहार और चांदनी में सैर करें।

हेमंत ऋतु (शीतपूर्व)

16 नवंबर – 13 जनवरी। जठराग्नि सबसे प्रबल होती है — घी, तिल और गर्म दूध जैसे समृद्ध, पौष्टिक आहार के लिए आदर्श ऋतु। मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण (उत्तर दिशा की यात्रा) का प्रतीक है। तेल मालिश (अभ्यंग) और मध्यम व्यायाम की विशेष सलाह दी जाती है।

शिशिर ऋतु (शीत)

14 जनवरी – 13 मार्च। सबसे ठंडी ऋतु। गर्म आहार, गर्म सूप और मसालेदार पेय लेते रहें। तेल मालिश और अतिरिक्त विश्राम शरीर को ठंड और सूखेपन से निपटने में सहायता करते हैं। महाशिवरात्रि इसी ऋतु में पड़ती है, जो इसे ध्यान और उपवास के लिए आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैदिक साहित्य और संस्कृति में ऋतु

षड्-ऋतु पद्धति भारतीय सभ्यता की सबसे प्राचीन पंचांग अवधारणाओं में से एक है, जो ऋग्वेद (~1500 ई.पू.) और अथर्ववेद में प्रलेखित है। वेदांग ज्योतिष ऋतु-संक्रमण के नियम प्रदान करता है। आचार्य चरक की चरक संहिता ऋतुचर्या को एक पूरा अध्याय समर्पित करती है, जो दर्शाता है कि ऋतु पद्धति चिकित्सा में कितनी गहराई से समाहित थी। कालिदास की प्रसिद्ध कृति ऋतुसंहार ('ऋतुओं की माला,' ~चौथी शताब्दी ई.) सभी छह ऋतुओं का अत्यंत सुंदर काव्यात्मक वर्णन करती है।

ऋतु का सांस्कृतिक प्रभाव संगीत, कला और कृषि में व्यापक है। शास्त्रीय भारतीय संगीत विशिष्ट ऋतुओं के लिए राग निर्धारित करता है — राग मेघ मानसून का आह्वान करता है, राग बहार वसंत को चित्रित करता है। कृषि पंचांगों ने ऐतिहासिक रूप से बुआई और कटाई के चक्रों को ऋतु-संक्रमण के अनुसार व्यवस्थित किया है। आज भी ग्रामीण भारत के पारंपरिक कृषक समुदाय वैदिक ऋतु पंचांग के अनुसार कृषि कार्यों का समय निर्धारित करते हैं, जो इस पद्धति की स्थायी व्यावहारिक प्रासंगिकता को प्रदर्शित करता है।