Mahavir Jayanti
Lord Mahavir
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
महत्व और कथा
महावीर जयंती वर्धमान के जन्म का उत्सव मनाती है, जो आगे चलकर भगवान महावीर के नाम से जाने गए और जैन धर्म के चौबीसवें तथा अंतिम तीर्थंकर हुए। तीर्थंकर वह आत्मा है जो मुक्ति प्राप्त करती है और दूसरों को सांसारिक सागर पार करने का मार्ग दिखाती है। एक राजपरिवार में जन्मे महावीर ने अपना राजसी जीवन त्याग दिया और दीर्घ तपस्या के बाद वह महान उपदेष्टा बने जिनके वचन आज भी जैन परंपरा का मार्गदर्शन करते हैं।
उनका उपदेश कुछ ही व्रतों के एक समुच्चय पर टिका है जो समूचे जीवन को व्यवस्थित करता है। इसका केंद्रीय व्रत अहिंसा है, अर्थात् मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को हानि न पहुँचाना। इसके साथ सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (अनासक्ति तथा संग्रह का त्याग) खड़े हैं। ये पाँच व्रत बाहर से थोपे गए नियमों के रूप में नहीं, बल्कि उस अनुशासन के रूप में पढ़े जाते हैं जो आत्मा को हानि और तृष्णा से मुक्त करता है।
यह दिन चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, अर्थात् चैत्र के शुक्ल पक्ष की तेरहवीं तिथि को पड़ता है, जो प्रायः मार्च या अप्रैल में आता है। समूचे भारत में यह सर्वाधिक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला जैन पर्व है, जिसे दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराएँ मनाती हैं। इसका स्वरूप उत्सवी कम और भक्तिपूर्ण तथा सुधारवादी अधिक है: यह तीर्थंकर का सम्मान करने, उनके जीवन को स्मरण करने और उनके सिखाए व्रतों के प्रति अपने संकल्प को नवीन करने का दिन है।
अनुष्ठान एवं परंपरा
अनुष्ठान शांत होता है और मंदिर, दान तथा चिंतन पर केंद्रित रहता है। सामान्य प्रथाओं में निम्नलिखित हैं:
- अभिषेक (विधिवत स्नान): तीर्थंकर की प्रतिमा को जल और अर्पणों के साथ विधिवत स्नान (अभिषेक) कराया जाता है, जिसके बाद उसे श्रृंगारित कर पूजा जाता है।
- रथ-यात्रा (शोभायात्रा): अनेक नगरों में भगवान महावीर की प्रतिमा को शोभायात्रा में ले जाया जाता है, जिसके साथ भक्त, स्तुति-गान और उनके उपदेशों का पाठ चलता है।
- पाठ और कथा: महावीर के जीवन और पाँच व्रतों पर श्लोकों एवं प्रवचनों का पाठ तथा विवेचन होता है, ताकि दिन का अर्थ केवल चिह्नित होने के बजाय नवीन हो उठे।
- दान और भिक्षादान: अनासक्ति के अनुरूप जरूरतमंदों को देना इस दिन का केंद्र है, और अनेक लोग भोजन वितरण, चिकित्सा सहायता या पशुओं की देखभाल में सहयोग करते हैं।
- व्रत और मंदिर दर्शन: भक्त व्रत या सात्त्विक आहार रखते हैं और दर्शन तथा पूजन हेतु मंदिर जाते हैं, जिससे दिन भोज के बजाय संयम की ओर मुड़ता है।
- पाँच व्रतों पर चिंतन: यह दिन अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पर विचार करने और उनके अनुसार जीने के अपने संकल्प को नवीन करने के लिए रखा जाता है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
Observed on the Trayodashi tithi of Chaitra (Shukla paksha), reckoned by sunrise (udaya tithi).
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।