दीप अमावस्या
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
दीप अमावस्या का अर्थ
दीप अमावस्या महाराष्ट्र के अमांत कैलेंडर में आषाढ़ के समापन की अमावस्या है, जिसके अगले दिन श्रावण आरंभ होता है। इसका पारंपरिक मराठी नाम दिव्यांची अमावास्या, अर्थात दीपों की अमावस्या, घर की रीति को सीधे बताता है: दैनिक पूजा में उपयोग होने वाले दीपों को साफ कर फिर से तैयार और सम्मानित किया जाता है।
यह दीपावली जैसा सार्वजनिक प्रकाशोत्सव नहीं है। परिवार पीतल की समई, निरांजन और अन्य तेल के दीपों को साफ और चमकाकर देवस्थान के पास सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं, बातियाँ जलाते हैं और दीप-पूजन करते हैं। कुछ घरों में गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से मीठे दीप बनाकर भाप में पकाए जाते हैं, नैवेद्य चढ़ाया जाता है और बाद में प्रसाद के रूप में खाया जाता है।
इसी तिथि को लोकप्रिय बोलचाल में गटारी अमावस्या भी कहा जाता है, क्योंकि इसके बाद श्रावण में कई परिवार आहार-संयम रखते हैं। भोजन या दावत से जुड़ी यह लोकप्रिय प्रथा दीप-पूजन का धार्मिक अर्थ नहीं है। यह पृष्ठ पारंपरिक दीप-आराधना को केंद्र में रखता है और बाद में प्रचलित नाम को केवल सामाजिक संदर्भ के रूप में बताता है।
अनुष्ठान एवं परंपरा
दीप अमावस्या मुख्यतः घर में मनाई जाती है। विधियाँ परिवार के अनुसार बदलती हैं, पर पूजा का केंद्र स्वयं दीप रहते हैं।
- दीपों की सफाई: घर के तेल के दीप, पीतल की समई और निरांजन धोकर या चमकाकर पूजा के लिए तैयार किए जाते हैं।
- दीप-पूजन की सजावट: दीपों को देवस्थान के पास व्यवस्थित रखकर परिवार की परंपरा के अनुसार रंगोली, फूल, हल्दी और कुमकुम से सजाया जाता है।
- दीप प्रज्वलित कर पूजा: तेल या घी और बाती डालकर दीप जलाए जाते हैं तथा उनके सामने आरती या पारिवारिक प्रार्थना की जाती है।
- आटे के दीप बनाना: कुछ महाराष्ट्रीय परिवार मीठे गेहूँ के आटे से छोटे दीप बनाकर भाप में पकाते हैं, घी-बाती के साथ अर्पित करते हैं और बाद में प्रसाद बाँटते हैं।
- श्रावण की तैयारी: आषाढ़ के अंतिम दिन दीप और घर का देवस्थान तैयार करके अगले दिन शुरू होने वाले भक्ति-मास श्रावण का स्वागत किया जाता है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
यह पर्व चंद्र पंचांग के अनुसार श्रावण कृष्ण अमावस्या के संयोग पर निर्धारित होता है।
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।