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भाव बल (भाव की शक्ति) क्या है?

भाव बल ('भाव की शक्ति') मापता है कि आपकी कुण्डली में बारह भावों में से प्रत्येक कितना अच्छी तरह समर्थित है। जहाँ षड्बल ग्रहों को अंक देता है, वहीं भाव बल स्वयं भावों को अंक देता है — यह बताता है कि जीवन के कौन से क्षेत्र अपने फल देने की सबसे अधिक शक्ति रखते हैं।

प्रत्येक भाव अपना कुल बल तीन स्रोतों से अर्जित करता है: उसके स्वामी की शक्ति (भावाधिपति बल), उसकी दिशागत स्थिति (भाव दिग् बल), और उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ (भाव दृष्टि बल)। ये तीनों मिलकर विरूपा में कुल बनते हैं, जो 60 विरूपा प्रति रूपा की दर से रूपा में परिवर्तित होता है।

भाव बल (भाव की शक्ति)

भाव बल गणना जो बारह भावों में से प्रत्येक की शक्ति दर्शाती है।

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भाव शक्ति के तीन स्रोत

भावाधिपति बल (स्वामी का बल)

भाव स्वामी का षड्बल, जो उसके द्वारा शासित भाव में स्थानांतरित होता है। बलवान स्वामी अपने भाव को फल देने की शक्ति प्रदान करता है; दुर्बल स्वामी से भाव संघर्ष करता है, चाहे उसमें कोई भी ग्रह बैठा हो।

भाव दिग् बल (दिशागत बल)

प्रत्येक भाव के नैसर्गिक कारक के दिशा द्वारा सुस्थित होने से प्राप्त बल। धन, पराक्रम और लाभ के भाव अपने शास्त्रीय कारकों के दिशागत बल पर आधारित होते हैं।

भाव दृष्टि बल (दृष्टिगत बल)

भाव पर पड़ने वाली कुल दृष्टि — शुभ दृष्टियाँ (गुरु, शुक्र, बुध) बल जोड़ती हैं; पाप दृष्टियाँ (शनि, मंगल, राहु-केतु) बल घटाती हैं। जब पाप ग्रहों की प्रधानता हो तो यह घटक ऋणात्मक हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न