दुर्गा पूजा
देवी दुर्गा
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
संबंधित पर्व-क्रम
दुर्गा पूजा क्या है
दुर्गा पूजा महिषासुर पर देवी की विजय और उनके हर साल घर लौटने का उत्सव है। बंगाल में देवी को ऐसी बेटी के रूप में देखा जाता है जो अपने बच्चों, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक, के साथ मायके आती है और अंतिम दिन विदा होती है। ये पाँच दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की षष्ठी से दशमी तक होते हैं, यानी वही दिन जिन पर देश के बाकी हिस्सों में शारदीय नवरात्रि पूरी होती है।
हर दिन का अपना काम है। महा षष्ठी को बोधन, यानी देवी का जागरण होता है और प्रतिमा का मुख खोला जाता है। महा सप्तमी की शुरुआत कोला बउ (नवपत्रिका) के स्नान और मुख्य पूजा से होती है। महा अष्टमी सबसे व्यस्त दिन है, जिसमें सुबह की पुष्पांजलि और अष्टमी-नवमी के संधि-काल में संधि पूजा होती है। महा नवमी पूजा का अंतिम पूरा दिन है, और विजया दशमी सिंदूर खेला और विसर्जन के साथ पर्व को पूरा करती है।
शरद ऋतु की इस पूजा को अकाल बोधन कहा जाता है, यानी असमय का जागरण, क्योंकि देवी की मूल पूजा वसंत में होती थी। वह वसंत की पूजा आज भी चैत्र मास में बासंती पूजा के रूप में होती है। जब लोग दुर्गा पूजा खोजते हैं, तो लगभग हमेशा उनका मतलब शरद ऋतु का यही पर्व होता है।
बंगाल में हर दिन सूर्योदय के समय चल रही तिथि से तय होता है। एक तिथि एक दिन से थोड़ी छोटी होती है, पर कभी-कभी वह दो सूर्योदयों तक रहती है; तब पूजा का दिन पहले सूर्योदय वाली तारीख़ पर होता है और दूसरी तारीख़ पर कोई अलग पूजा-दिन नहीं होता। इसलिए पाँच दिन हमेशा पाँच तारीख़ों में नहीं समाते। 2027 में अष्टमी तिथि 7 और 8 अक्टूबर, दोनों सूर्योदयों पर है: महा अष्टमी 7 अक्टूबर को, महा नवमी 9 अक्टूबर को, और पूजा 5 से 10 अक्टूबर तक चलेगी। 2026 में ऐसा षष्ठी के साथ हुआ था, और पूजा 16 से 21 अक्टूबर तक चली।
अनुष्ठान एवं परंपरा
ज़्यादातर पूजा सामुदायिक पंडालों में होती है, और बड़े परिवार घर पर भी पूजा रखते हैं। दिन-ब-दिन मुख्य अनुष्ठान:
- षष्ठी: बोधन, कल्पारंभ (पूरी पूजा करने का संकल्प) और बिल्व निमंत्रण (देवी को बेल के पेड़ में आमंत्रित करना)। प्रतिमा का ढका हुआ मुख खोला जाता है और पंडाल खुल जाते हैं।
- सप्तमी: कोला बउ, यानी लाल किनारी वाली साड़ी में लिपटा नौ पौधों का गुच्छा, भोर में नहलाया जाता है और गणेश के पास स्थापित किया जाता है। प्रतिमा में देवी का आवाहन होता है और रोज़ की मुख्य पूजा शुरू होती है।
- अष्टमी: सुबह की पुष्पांजलि में पूरे पर्व की सबसे बड़ी भीड़ होती है। कुछ पंडालों में कुमारी पूजा होती है, और अष्टमी-नवमी के संधि-काल में 108 दीपों और 108 कमलों से संधि पूजा की जाती है।
- नवमी: नवमी की पूजा और हवन, शाम की आरती, और विदाई से पहले आख़िरी पूरा दर्शन और भोग।
- दशमी: दर्पण विसर्जन (जल-दर्पण में देवी का प्रतिबिंब दिखाना), विवाहित स्त्रियों का सिंदूर खेला, शोभायात्रा और विसर्जन, और बड़ों तथा पड़ोसियों के साथ बिजोया की शुभकामनाएँ।
- पाँचों दिन: ढाक की थाप, शाम को पंडाल घूमना, नए कपड़े, और पंडालों में बँटने वाला खिचुड़ी, लाबड़ा और पायेश का भोग।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
यह पर्व चंद्र पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल षष्ठी के संयोग पर निर्धारित होता है।
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।