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अशुभ काल

Monday, फ़रवरी 18, 2030

Columbus, Ohio, US
Updated फ़र॰ 18, 2030
सूर्योदय 7:20 am सूर्यास्त 6:11 pm

Varjyam spans midnight

अशुभ समय

Rahu Kaal
8:42 am – 10:03 am 1h 21m
यात्रा व्यापार विवाह निवेश
Yamaganda Kaal
11:24 am – 12:46 pm 1h 21m
यात्रा व्यापार विवाह
Gulika Kaal
2:07 pm – 3:28 pm 1h 21m
शुभ कार्य नई शुरुआत
Dur Muhurat
1:07 pm – 1:51 pm 43m
3:17 pm – 4:01 pm 43m
महत्वपूर्ण निर्णय नए उद्यम यात्रा
Varjyam
10:41 pm – 12:11 am (फ़रवरी 19) 1h 30m
शुभ कार्य नई शुरुआत

अतिरिक्त अशुभ काल

Ganda Moola
7:20 am – 3:06 pm 7h 45m

Magha Nakshatra

नई शुरुआत शुभ कार्य
Aadal Yoga
3:07 pm – 7:19 am (फ़रवरी 19) 16h 12m

Sun-Moon combination yoga. Avoid military, agricultural, and construction work. Marriages are exempt.

कृषि निर्माण आक्रामक गतिविधियाँ

बाण समयरेखा

लग्न परिवर्तन के साथ दिन भर बाण कैसे बदलता है

शुभ Kumbha
7:20 am – 8:24 am 1h 4m
राज Meena
8:24 am – 9:35 am 1h 11m
अग्नि Mesha
9:35 am – 10:58 am 1h 23m
शुभ Vrishabha
10:58 am – 12:47 pm 1h 49m
राज Mithuna
12:47 pm – 3:05 pm 2h 18m
शुभ Karka
3:05 pm – 3:06 pm 1m
चोर Karka
3:06 pm – 5:36 pm 2h 30m
शुभ Simha
5:36 pm – 8:07 pm 2h 31m
रोग Kanya
8:07 pm – 10:37 pm 2h 30m
शुभ Tula
10:37 pm – 11:35 pm 58m
मृत्यु Tula
11:35 pm – 1:09 am (फ़रवरी 19) 1h 33m
अग्नि Vrishchika
1:09 am – 3:34 am 2h 25m
शुभ Dhanu
3:34 am – 5:35 am 2h 0m
राज Makara
5:35 am – 7:06 am 1h 31m
शुभ Kumbha
7:06 am – 7:19 am 12m

अशुभ काल क्या हैं?

वैदिक ज्योतिष प्रतिदिन कुछ विशिष्ट समय खंडों की पहचान करता है जो महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ करने के लिए प्रतिकूल माने जाते हैं। ये अशुभ काल — राहुकाल, यमगण्ड काल, गुलिक काल, दुर्मुहूर्त और वर्ज्यम — वार, स्थानीय सूर्योदय/सूर्यास्त के समय और प्रचलित नक्षत्र के आधार पर गणना किए जाते हैं। इन कालों में नया उद्यम शुरू करना, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना या यात्रा प्रारंभ करना परंपरागत रूप से वर्जित माना जाता है ताकि बाधाओं और असफलताओं से बचा जा सके।

सबसे अधिक देखा जाने वाला अशुभ काल राहुकाल है, उसके बाद यमगण्ड और गुलिक काल आते हैं। ये तीनों दिन के प्रकाश की अवधि को विभाजित करके निकाले जाते हैं और छाया ग्रह राहु-केतु तथा उपग्रह गुलिक (शनि पुत्र) से संबंधित हैं। दुर्मुहूर्त और वर्ज्यम की गणना अलग प्रकार से होती है — दुर्मुहूर्त वार पर आधारित होता है जबकि वर्ज्यम उस दिन के प्रचलित नक्षत्र पर निर्भर करता है।

अशुभ काल की जांच करना भारत भर के हिंदू परिवारों में सबसे सामान्य दैनिक प्रथाओं में से एक है। जो लोग विस्तृत ज्योतिष का अनुसरण नहीं करते, वे भी प्रायः राहुकाल में महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ करने से बचते हैं। यह प्रथा विशेष रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है, जहां राहुकाल का समय प्रतिदिन समाचार पत्रों में प्रकाशित होता है और रेडियो स्टेशनों पर घोषित किया जाता है।

अशुभ काल की गणना कैसे होती है?

राहुकाल, यमगण्ड और गुलिक काल की गणना दिन की अवधि (सूर्योदय से सूर्यास्त) को 8 बराबर भागों में विभाजित करके की जाती है। प्रत्येक भाग लगभग 90 मिनट का होता है, लेकिन ऋतु के अनुसार बदलता रहता है। कौन सा भाग राहुकाल बनेगा यह वार पर निर्भर करता है: सोमवार को दूसरा भाग, शनिवार को तीसरा, शुक्रवार को चौथा, बुधवार को पांचवां, गुरुवार को छठा, मंगलवार को सातवां और रविवार को आठवां भाग राहुकाल होता है। यमगण्ड और गुलिक काल भी इसी प्रकार की विधि से लेकिन भिन्न वार-क्रम से निकाले जाते हैं।

दुर्मुहूर्त की गणना दिन को 15 मुहूर्तों (प्रत्येक लगभग 48 मिनट) में विभाजित करके की जाती है। वार के आधार पर विशिष्ट मुहूर्तों को अशुभ चिह्नित किया जाता है। प्रतिदिन सामान्यतः दो दुर्मुहूर्त होते हैं। वर्ज्यम की गणना प्रचलित नक्षत्र से होती है — प्रत्येक नक्षत्र में एक निश्चित वर्ज्यम काल होता है, जो नक्षत्र के प्रारंभ समय से नक्षत्र-विशिष्ट निश्चित अंतरालों द्वारा गणना किया जाता है।

सभी गणनाएं स्थान पर निर्भर होती हैं क्योंकि वे स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पर आधारित हैं। चेन्नई में जो समय राहुकाल है, वह दिल्ली में उसी घड़ी के समय पर राहुकाल नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों शहरों में सूर्योदय का समय भिन्न होता है। इसीलिए सही अशुभ काल गणना के लिए सटीक स्थान की जानकारी आवश्यक है।

प्रमुख अशुभ काल

राहुकाल

सबसे व्यापक रूप से देखा जाने वाला अशुभ काल, छाया ग्रह राहु द्वारा शासित। प्रतिदिन लगभग 90 मिनट का होता है। नया उद्यम शुरू करने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने, यात्रा प्रारंभ करने या महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करने से बचें।

यमगण्ड काल

मृत्यु के देवता यम से संबंधित काल। इस अवधि में कार्य प्रारंभ करने से असफलता, हानि या नुकसान हो सकता है। विशेष रूप से यात्रा, वित्तीय निर्णय और महत्वपूर्ण व्यक्तिगत मामलों से बचें।

गुलिक काल

शनि के पुत्र गुलिक द्वारा शासित काल। इस अवधि में प्रारंभ किए गए कार्यों में बाधाएं, विलंब और असफलताएं आ सकती हैं। नए प्रारंभ, निवेश और शुभ अनुष्ठानों से बचें।

दुर्मुहूर्त

वार पर आधारित अशुभ समय खंड जो प्रतिदिन दो बार आते हैं। दुर्मुहूर्त में प्रारंभ किए गए कार्यों में अप्रत्याशित चुनौतियां आ सकती हैं। प्रत्येक दुर्मुहूर्त की अवधि लगभग 48 मिनट होती है।

वर्ज्यम

नक्षत्र पर आधारित अशुभ काल जो प्रतिदिन बदलता है। वर्ज्यम में प्रारंभ किए गए कार्यों में वांछित परिणाम नहीं मिल सकते। यह अनुष्ठानों, संस्कारों और महत्वपूर्ण जीवन की घटनाओं के लिए विशेष रूप से प्रतिकूल माना जाता है।

गंड मूल

चंद्रमा संधि नक्षत्रों (अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती) में। ये 6 नक्षत्र जल और अग्नि राशियों की संधि पर स्थित हैं। गंड मूल में प्रारंभ किए गए कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं।

भद्रा (विष्टि करण)

7वां करण (अर्ध-तिथि), चंद्र मास में लगभग 8 बार आता है। भद्रा में व्यापार, विवाह, यात्रा, अनुबंध और निर्माण प्रारंभ करना अशुभ माना जाता है। भद्रा लोक के अनुसार गंभीरता बदलती है — भू लोक (पृथ्वी) के काल सबसे हानिकारक होते हैं।

बाण (बाण पंचक)

पंचक सूत्र से गणना: (तिथि + वार + नक्षत्र + लग्न) mod 9। पांच अशुभ प्रकार: मृत्यु, अग्नि, राज, चोर और रोग। लग्न परिवर्तन के साथ दिन भर बदलता रहता है।

विदल योग

सूर्य-चंद्र संयोग योग, 28-नक्षत्र पद्धति (अभिजित सहित) से गणना। जब सूर्य से चंद्र के नक्षत्र की गिनती विशिष्ट स्थानों पर आती है तो विदल योग बनता है। सभी उद्यमों में असफलता देता है और व्यापक रूप से अशुभ माना जाता है।

आदल योग

विदल योग का पूरक, 28-नक्षत्र सूर्य-चंद्र गणना पर आधारित। आदल योग सैन्य गतिविधियों, कृषि और निर्माण कार्यों के लिए अशुभ है। हालांकि, विवाह और अन्य संस्कार (जीवन-चक्र अनुष्ठान) इसके प्रभाव से मुक्त हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऐतिहासिक संदर्भ

राहुकाल की अवधारणा की जड़ें समुद्र मंथन (ब्रह्मांडीय सागर के मंथन) की पौराणिक कथा में गहराई से समाई हैं। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, स्वर्भानु नामक दानव ने छद्म रूप धारण करके अमृत पी लिया। भगवान विष्णु ने उसका शिर काट दिया, लेकिन चूंकि उसने पहले ही अमृत पी लिया था, दोनों भाग जीवित रहे — शिर राहु बना और धड़ केतु। छाया ग्रह होने के कारण राहु और केतु छल, माया और अप्रत्याशित व्यवधानों से जुड़े हैं, इसीलिए उनके काल को नए कार्यों के प्रारंभ के लिए अशुभ माना जाता है।

दैनिक अशुभ कालों की व्यवस्थित गणना मध्यकालीन ज्योतिष ग्रंथों जैसे मुहूर्त चिंतामणि और कालप्रकाशिका में संहिताबद्ध हुई। दक्षिण भारतीय ज्योतिषियों ने विशेष रूप से राहुकाल के पालन को विकसित और लोकप्रिय बनाया, जो तमिल, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से समा गया। यह प्रथा इतनी व्यापक थी कि भारतीय रेलवे भी ऐतिहासिक रूप से उद्घाटन रेल सेवाओं के प्रस्थान का समय राहुकाल में निर्धारित करने से बचता था।