गौण देवउठनी एकादशी
भगवान विष्णु
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
विष्णु जागरण का बाद वाली वैष्णव तिथि पर पालन
आध्यात्मिक पर्व देवउठनी एकादशी ही है, अर्थात कार्तिक शुक्ल एकादशी जब भगवान विष्णु को चार महीने के चातुर्मास-शयन से जागा माना जाता है। गौण देवउठनी कोई दूसरा जागरण और अलग कथा नहीं है। यह उस असाधारण तिथि-सूर्योदय क्रम में वैष्णव व्रत के लिए चुनी गई बाद की नागरिक तिथि है, जब सामान्य स्मार्त पालन उससे अलग पड़ता है।
यहाँ दिखने वाले क्षय क्रम में एकादशी पहले दिन के सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है। तिथि किसी सूर्योदय पर नहीं रहती, इसलिए सामान्य एक-दिन नियम यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। पंचांग पहले दिन देवउठनी एकादशी और अगले दिन गौण या वैष्णव देवउठनी दिखाता है; बाद वाला दिन किसी विशिष्ट महाद्वादशी नाम से भी जाना जा सकता है।
बाद की तिथि रखने वाले के लिए धार्मिक भाव विष्णु जागरण और चातुर्मास की समाप्ति ही है। विष्णु पूजा, दीप, एकादशी संयम और तुलसी विवाह से संबंध प्रासंगिक रहते हैं। पहले दिन की सूची से पारण समय नहीं लेना चाहिए: गौण व्रत का पारण गौण तिथि के अगले प्रातः, स्थानीय वैष्णव समय में होता है।
अनुष्ठान एवं परंपरा
पास-पास की दो तिथियाँ दो पूर्ण व्रत करने का निर्देश नहीं, बल्कि दो पालन-पद्धतियों में चुनाव हैं। अपने घर या वैष्णव मंदिर का पंचांग अपनाएँ।
- सही परंपरा चुनें: परिवार स्मार्त पंचांग मानता है तो सामान्य देवउठनी एकादशी रखें। संप्रदाय बाद की महाद्वादशी तिथि देता है तो गौण या वैष्णव देवउठनी रखें।
- स्थानीय तिथि की पुष्टि करें: सूर्योदय और तिथि-सीमा स्थान के अनुसार बदलती है। दूसरे शहर की वैष्णव तिथि आपके स्थान पर, विशेषकर भारत से बाहर, ज्यों की त्यों लागू नहीं हो सकती।
- एकादशी व्रत रखें: अनाज, दाल और फलियाँ त्यागें। स्वास्थ्य और स्थापित रीति के अनुसार निर्जल, केवल जल या फल-दूध और अनुमत निरन्न आहार लिया जा सकता है।
- विष्णु जागरण की पूजा करें: दीप जलाएँ, तुलसी, फूल और फल अर्पित करें, विष्णु नाम जपें और देवउठनी व्रत कथा पढ़ें। कुछ परिवार क्षेत्रीय रीति से प्रतीकात्मक चरण-चिह्न या जागरण सजावट बनाते हैं।
- तुलसी विवाह का संबंध समझें: परिवार की परंपरा के अनुसार तुलसी विवाह इसी दिन या पास की तिथि पर हो सकता है। स्थानीय रीति इसे किसी अन्य निकट तिथि पर रखती हो तो केवल गौण व्रत खिसकने के कारण उसे न बदलें।
- सही प्रातः पारण करें: गौण देवउठनी के अगले दिन उसी के पारण समय में व्रत खोलें, सामान्य तिथि वाले पारण में नहीं। द्वादशी छोटी हो तो अवधि सीमित हो सकती है, इसलिए शहर-विशिष्ट पंचांग देखें।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
यह पर्व चंद्र पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के संयोग पर निर्धारित होता है।
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।