सकट चौथ
भगवान गणेश
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
महत्व और कथा
सकट चौथ माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (चौथी तिथि) है, जो जनवरी या फरवरी में पड़ती है। संकष्टी चतुर्थी — पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी — हर चंद्र मास में आती है और विघ्नहर्ता भगवान गणेश (गणपति) को समर्पित है। वर्ष की बारह चतुर्थियों में से माघ की चतुर्थी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, इसीलिए इसका अपना अलग नाम है। 'संकष्टी' का अर्थ है कष्ट से मुक्ति, और यह दिन गणेश से घर-परिवार के कष्ट दूर करने की प्रार्थना के लिए रखा जाता है।
व्यवहार में यह व्रत सबसे अधिक माताएँ रखती हैं, अपनी संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए। यही पारिवारिक भावना इस दिन को विशेष बनाती है: यह किसी मंदिर के पर्व से अधिक एक घरेलू व्रत है, जिसे दिन भर शांति से रखा जाता है और रात में पूर्ण किया जाता है। यह व्रत कठिन होता है — बहुत से लोग चंद्रदर्शन तक निर्जला (बिना अन्न-जल) रहते हैं — और इसे खोलना घड़ी से नहीं बल्कि चंद्रोदय से जुड़ा होता है, इसलिए यह दिन स्वाभाविक रूप से देर शाम तक चलता है।
कई क्षेत्रीय नाम इसी दिन की ओर संकेत करते हैं। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इसे तिलकुटा चौथ या तिल चौथ कहते हैं, क्योंकि प्रसाद में तिल के बने मीठे पकवान प्रमुख होते हैं; माह के कारण इसे माघी चौथ भी कहा जाता है, और जिस संकट से यह मुक्ति दिलाती है उसके कारण इसे सकट चौथ या संकट चौथ कहते हैं। इन सबमें समान धागा है गणेश पूजा, चंद्रोदय व्रत और अपनी संतान को सुरक्षित व स्वस्थ रखने की कामना।
अनुष्ठान एवं परंपरा
सकट चौथ कैसे मनाई जाती है:
- व्रत रखने वाली — प्रायः माता — सूर्योदय से लेकर रात में चंद्रोदय के बाद व्रत खोलने तक दिन भर का उपवास रखती हैं, अनेक लोग निर्जला (बिना अन्न-जल) रहते हैं।
- भगवान गणेश की घर पर मिट्टी या हल्दी की प्रतिमा, दीपक और दिन की व्रत कथा के पाठ के साथ पूजा की जाती है।
- तिल और गुड़ से बने मीठे पकवान (तिल-गुड़ या तिलकुट) बनाकर अर्पित किए जाते हैं — यही प्रसाद इस दिन को तिलकुटा चौथ नाम देता है — जिन्हें अक्सर छोटे टीले या लड्डू के रूप में बनाया जाता है।
- चंद्रदर्शन होने तक व्रत नहीं खोला जाता। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल (अर्घ्य) और पूजा अर्पित की जाती है, उसके बाद गणेश को चढ़ाया गया भोग पहले आहार के रूप में ग्रहण किया जाता है।
- अनेक परिवार एक भाग गाय को अर्पित करते हैं या तिल के पकवान बच्चों और पड़ोसियों में बाँटते हैं, जो इस दिन के बाल-कल्याण के भाव के अनुरूप है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
यह पर्व चंद्र पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण चतुर्थी के संयोग पर निर्धारित होता है।
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।