करवा चौथ
यह कब पड़ता है
तिथि बदलती है क्योंकि यह चंद्रमा का अनुसरण करती है, ग्रेगोरियन कैलेंडर का नहीं।
भारत (IST) के लिए सटीक पंचांग गणना। दूर पूर्व या पश्चिम के स्थानों पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
करवा चौथ क्यों रखा जाता है
करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पड़ता है, जो प्रायः अक्टूबर या नवंबर में होती है। इस नाम में करवा — एक टोंटीदार मिट्टी का पात्र, जिससे चंद्रमा को जल अर्पित किया जाता है — और चौथ, यानी चौथी चंद्र तिथि, जुड़े हुए हैं। यह मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत में, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मनाया जाता है।
इस पर्व के मूल में एक संकल्प निहित है: विवाहित महिलाएँ अपने पतियों की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए सूर्योदय से पहले से चंद्रोदय तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए व्रत रखती हैं। कई परिवारों में अविवाहित कन्याएँ भी अपने मँगेतर या मनचाहे जीवनसाथी को मन में रखकर यह व्रत रखती हैं। सबसे प्रचलित कथा सावित्री की है, जिसने अपने पति सत्यवान को वापस पाने के लिए यमराज का अनुसरण किया, और साथ ही रानी वीरवती की कथा है, जिसे छल से समय से पहले व्रत खोलने के लिए विवश कर दिया गया — यह स्मरण कराते हुए कि व्रत को वास्तव में चंद्र दर्शन तक ही रखा जाना चाहिए।
देवी पार्वती को भक्ति के आदर्श रूप में पूजा जाता है, और दिनभर की कथाओं के माध्यम से करवा माता का आह्वान किया जाता है। यह व्रत कठिन है — पूरे दिन बिना जल के रहना प्रतीकात्मक मात्र नहीं है — और समय के साथ यह सामूहिक संगति का अवसर भी बन गया है, जहाँ घर और पड़ोस की महिलाएँ एकत्र होकर सजती-सँवरती हैं और एक साथ व्रत का यह अनुष्ठान निभाती हैं।
अनुष्ठान एवं परंपरा
यह दिन भोर से पहले के भोजन से लेकर चंद्रोदय की पूजा तक चलता है। परंपराएँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न होती हैं, परंतु इसका मूल क्रम एक समान रहता है।
- भोर से पहले सरगी: व्रत की शुरुआत सरगी खाने के बाद होती है, जो सूर्योदय से पहले का भोजन है और परंपरागत रूप से सास द्वारा भेजा जाता है — आमतौर पर फल, मिठाइयाँ और ऐसे खाद्य पदार्थ जो बिना जल के लंबे दिन को सहने में सहायक होते हैं।
- दिनभर निर्जला व्रत: महिलाएँ सूर्योदय से चंद्र दर्शन तक कठोर निर्जल व्रत (निर्जला व्रत) रखती हैं और अन्न-जल पूरी तरह त्याग देती हैं।
- दोपहर में कथा और पूजा: महिलाएँ प्रायः लाल या उत्सवी वस्त्रों में, मेहँदी और चूड़ियों के साथ एकत्र होती हैं, करवा चौथ की कथा (कथा) सुनती हैं और पार्वती तथा करवा माता की पूजा करती हैं, सजे हुए करवों को घेरे में एक-दूसरे को देती हुई।
- चंद्रोदय दर्शन: व्रत केवल चंद्रोदय के बाद ही खोला जाता है। कई लोग सायंकालीन पूजा मुहूर्त को मार्गदर्शक के रूप में लेते हैं, परंतु वास्तविक समय स्थानीय चंद्रोदय पर निर्भर करता है।
- अर्घ्य और व्रत खोलना: महिला छलनी से चंद्रमा को देखती है, करवा से जल अर्पित (अर्घ्य) करती है, फिर उसी छलनी से अपने पति को देखती है; पति उसे जल का पहला घूँट और भोजन का पहला निवाला देकर व्रत संपन्न कराता है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
यह तिथि कैसे निर्धारित होती है
Observed on the Chaturthi tithi of Kartik (Krishna paksha), reckoned by moonrise (chandrodaya). Should the tithi fall across two days, tradition keeps the earlier day (purva-viddha).
तिथियाँ NASA/JPL की खगोलीय गणना से निकाली जाती हैं और पारंपरिक पंचांग के अनुरूप होती हैं।